चमोली
देवभूमि उत्तराखंड के पहाड़ इन दिनों सिर्फ गर्मी से नहीं, बल्कि वनाग्नि की घटनाओं से भी तप रहे हैं। तापमान बढ़ते ही जंगलों में आग की घटनाएं तेजी से सामने आ रही हैं और हालात अब चिंताजनक होते जा रहे हैं। हर दिन कहीं न कहीं से उठता धुआं न सिर्फ हरियाली को निगल रहा है, बल्कि वन्य जीवों के जीवन और आसपास के मानव बस्तियों के लिए भी खतरे की घंटी बन चुका है।
चमोली जिले के बद्रीनाथ वन प्रभाग में हालात से निपटने के लिए वन विभाग पूरी ताकत झोंक रहा है। दावानल को रोकने में बद्रीनाथ वन प्रभाग के 165 फायर वाचर, 78 फॉरेस्ट गार्ड, 45 वन कर्मी, 5 डिप्टी रेंजर और 4 रेंजर दिन-रात जंगलों की निगरानी में जुटे हैं। इसके बावजूद दावानल की घटनाएं कम होने का नाम नहीं ले रही—जो साफ इशारा है कि चुनौती अब पहले से कहीं ज्यादा बड़ी हो चुकी है।
डीएफओ सर्वेश कुमार दूबे के मुताबिक, विभागीय टीमें लगातार जंगलों में गश्त कर रही हैं और आग को फैलने से रोकने के लिए कंट्रोल बर्निंग और फायर लाइन काटने जैसे उपाय अपनाए जा रहे हैं। लेकिन सवाल ये है—क्या ये प्रयास काफी हैं?

वन विभाग अब सिर्फ बुझाने नहीं, बल्कि रोकने की रणनीति पर काम कर रहा है। गांव-गांव जाकर जागरूकता अभियान चलाए जा रहे हैं, सरपंचों और ग्रामीणों के साथ बैठकें हो रही हैं, ताकि लोग खुद भी जंगल बचाने की जिम्मेदारी समझें।
डीएफओ ने साफ चेतावनी दी है—जंगल में आग लगाना सिर्फ लापरवाही नहीं, बल्कि गंभीर अपराध है। भारतीय वन अधिनियम 1927 की धारा 26 के तहत यह गैर-जमानती अपराध है, जिसमें दो साल तक की सजा या पांच हजार रुपये तक का जुर्माना या दोनों हो सकते हैं।
इस पृरी घटना को लेकर अब सच्चाई यह भी है कि जब तक आम लोग आगे नहीं आएंगे, तब तक यह आग यूं ही जंगलों को निगलती रहेगी ।
